बौद्ध धम्म में वर्षावास का बड़ा ही महत्व है। इसका प्रारम्भ बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने किया था। वर्षावास के तीन माह में भिक्षु एवं श्रामणेर विहार में रहकर बौद्धधर्म की बारीकियों का अध्ययन मनन करते हैं।गुरु पुर्णिमा या आषाढ पौर्णिमा के दिन वर्षावास शुरू होता है, और यह आश्विनी पुर्णिमा कों समाप्त होता है।
बुद्ध के समय काल में बुद्ध ने सभी भिक्षुओं को आदेश दिया की वे धम्म का प्रचार प्रसार करे और सभी बौद्ध भिक्षु इस काम में लग गए लेकीन यह काम करते हुए उन्हें कई संकटो को सामना करना पड़ता और खास कर बारिश के मौसम में कई नदियों में बाढ़ के कारण बौद्ध भिक्षु बह जाते थे और उनके चलने से फसलों को नुकसान भी पहुँचता था इस लिए उन्होंने बुद्ध से शिकायत की और फिर बुद्ध ने आदेश दिया की आषाढ पुर्णिमा से आश्विनी पुर्णिमा सभी भिक्षु एक स्थान पर रहे वे गांवों में भिक्षाटन हेतु न जाए और एक स्थान पर रह कर धम्म का प्रचार करे आवश्यकता पड़ने पर भिक्षु अपने गुरु से अधिकतम एक सप्ताह का अवकाश लेकर विहार से बाहर जा सकता है तो यह वर्षावास बुद्ध के समय काल से ही मौजूद है। बुद्ध ने अपना पहला वर्षावास ई.स.पूर्व 527 में सारनाथ के ऋषीपतन में किया और उस के बाद इस स्थान पर ही 45वाँ वर्षावास भी किया इस के आलावा उन्होंने श्रावस्ती, जेतवन, वैशाली, राजगृह इत्यादी विहार में वर्षावास किये यह वर्षावास थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कम्बोडिया और बांग्लादेश के बौद्ध भी इस का पालन करते है।
वर्षावास के समय बौद्ध धम्म के उपासक और उपासिकाओं को भी आष्टांगिक मार्ग का पालन करने की कोशिश करना चाहिए और इसके साथ पंचशील के नियमो का कड़ाई से पालन करना चाहिए जैसे झूठ न बोलना, नशा न करना, अकारण हिंसा न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना इस के अलावा रोज बुद्ध वन्दना लेना , बौद्ध भिक्षु को भोजन का दान, और वर्षावास के समय दिन में बौद्ध भिक्षु के सामान केवल एक बार भोजन करना आदि...

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